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Sattuz

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Mr. Rajeev on Sattu...z

" यक्कू "....by Mr. Rajeev ji

बात तब की है जब टीवी पर क्रूर सिंह के "यक्कू" बोलने पर डर लगने लगता था कि ये कलमुहां फिर से कोई षडयंत्र करके पंडित जगन्नाथ को फसाने वाला है, उस समय हमारे घर में माँ पराठा और भुजिया बना रही होती थी और हम सारे बच्चे आधे टुकड़े पराठे को एक व्यवसायिक  विश्राम तक चलाते थे... माताराम पीछे से बोलती हुई आती थी अब एम्प्रो का प्रचार शुरू हुआ अब तो खाना खत्म करो, आग लगे इस चन्द्रकान्ता सीरियल को... 
 
आज सालों बाद भी उस पराठे-भुजिया का कॉम्बिनेशन जहन में है, कोई दूसरा डिस वो फील नही दे पाता, ठीक वैसे ही जैसे सुसज्जित लाइब्रेरी में रखी किताबें आपको वो फील नहीं देती जो गांव की लाइब्रेरी के लकड़ी के आलमीरे में रखी हुई किताबों की सुगंध... 
 
पिछले 8 सालों से भारत के विभिन्न राज्यों,शहरों,गांवो में घूम रहा हूँ और अपने काम के साथ स्थानीय भोजन का भी लुफ्त उठा रहा हूँ... एक दिलचस्प किस्सा मध्य प्रदेश के धार जिला के मनावर  से है। मैं मनावर में कपास प्रशिक्षण के सिलसिले में गया था एवं गेस्ट हाउस में ठहरा था... मनावर दो राज्यों के अड़ोस-पड़ोस में था, महाराष्ट्र एवं गुजरात.. हर चीज में हींग इम्पोर्टेन्ट था, दाल में मूंगफली भी इम्पोर्टेन्ट था। पहले अजीब सा लगा कि यार ऐसे कौन खाना बनाता है, सब चीज में अपनी चीजें घुसेड़ देते हैं, फिर लगा खाना तो खाना है... नहीं कुछ से कुछ अच्छा... 2 महीने के प्रवास में मुझे मिक्स कल्चर वाले भोजन से प्रेम सा हो गया। अभी भी वो दाल मिस करता हूँ... 
 
ओह! पोहा और मिर्ची वाली पकौड़ी के बारे में बताना भूल गया था, सुबह का नाश्ता हर अमीर-गरीब का लगभग वही होता था, उसका टेस्ट अंग्रेजी के शब्दों में "इनक्रेडिबल" था। 
 
उसके बाद चैन्नई के "शिवगंगा" में "धान प्रशिक्षण" के लिए जाना हुआ। सुबह का नाश्ता तो इडली-सांभर ने संभाल दिया लेकिन दिन का खाना... फिर से इडली-सांभर... "ई ना चोलबे दादा..." मैंने अपने फेसबुक पेज पर इडली-सांभर की फ़ोटो चेपते हुए गुहार लगाई की भाइयों एवं बहनों... बिहारी आदमी इस जगह कैसे जियेगा... बिना भात के... आधे घंटे में कुछ क्लू मिले और भात पेट के अंदर गया... मल्लब आप हम बिहारियों को पाताल लोक भेज दो वो चलेगा लेकिन भात नहीं खायेंगे तो कैसे चलेगा... आप ही बताइये।
 
कुल मिलाकर अच्छा प्रवास रहा, बहुत कुछ सीखा,देखा और समझा वंहा के कल्चर को.. दक्षिण के लोग मृदुभाषी तो होते ही हैं लेकिन उनकी धार्मिक मान्यताएँ,उनका पहनावा, उनका रहन-सहन,उनका खान-पान, वंहा की हरियाली पूरे भारत में सबसे जुदा है। 
 
इसी बीच में खबर आई कि माँ बीमार चल रही है, तुरन्त छुट्टी मिली... घर गया कुछ दिन के लिए... एक उम्र के बाद शरीर आराम चाहता है, माँ को भी चाहिए था। मेरे आने की खबर से माँ की आधी बीमारी कम हो गयी थी... घर पहुंचने के बाद माताराम पूरे फॉर्म में दिखी, पसन्द के सारे व्यंजन बने पड़े थे... मैं रोता रहा और माँ चुप कराते हुए "कनी भात और ल ले" करके खिलाती रही। 
 
मेरे जैसे बहुत से अभागे आपके अगल-बगल में दिखेंगे जो घर की जरूरत पूरी करने के लिए घर से, माँ-बाप से, समाज से और अपने दोस्तों से दूर हैं। 
 
रात के 1:20 बज रहे हैं, आँखों से नींद कोसों दूर है, कल मैं रहूँ न रहूँ लेकिन जब कभी भविष्य में घर से बाहर रह कर काम करने वालों की दशा पर बात होगी तो मेरी पंक्तियां मेरा परिचय करवायेगी।
 
अगर कोई मरने से पहले आखिरी इच्छा पूछे तो मैं माँ के हाथ की बनी "पराठा-भुजिया" ही मांगूगा।
 
जिंदगी अपने रफ्तार से दौर रही है, बस इस कश्मकश में हूँ कि ये पड़ाव है या मंजिल मेरी... 

ठिठोली... by Rajeev

 
 
चुनावी भोज!
 
अगर पेट पूजा राजनीती सी होती तो सुबोध कक्का का रोल नंबर पहले से 100 नंबर पहला होता l सुबोध कक्का अपने सामने किसी को भेलूए नै देते थे... बच्चे से ही अगुआ थे हमारे सुबोध कक्का भोज-भात में... चालक इतने की खौकार शब्द को “मन-तृप्ति” शब्द रखवा दिया था l बारीक सब भोज-भात में कठ्पिन्ग्ल सा बिहेव करते हैं... बारीक़ भी दो-तीन प्रकार के होते हैं भोज में ... पहले जो जबरदस्ती खिलाते हैं, दुसरे जो इशारे से दुसरे बारीक़ को बताते हैं “रे सबठो माउस इधरे उझलेगा त चिखना खत्म हो जायेगा” और तीसरे जो कहते हैं “नै लेना है त जियान काहे करते हैं जी”.. 
खैर अपने सुबोध कक्का को इनसब बारिकों के बिहेव से खासा फर्क नहीं पड़ता था... पेट-पूजा माने “मन-तृप्ति” वाले सिद्धान्त को धर्म मानते हुए वो भोग लगाते थे ...
 
बिहार के भोज में सामान्यतौर पर भरपेट्टा बला हिसाब किताब रहता है और साथ मे “पारस” का भी प्रोविजन होता है l "पारस" में घर के उन लोगों  के लिए भोजन भेजा जाता है जो भोज में नहीं आ पाते हैं।
 
अच्छा हाँ, मैं पेट-पूजा के राजनीती से सम्बंधित बातें बता रहा था... “खौकार टाइप के लोग अक्सर दल-बदलू स्वभाव के होते हैं... मतलब की उनका ऑब्जरवेशन और गेस इतना भयंकर टाइप से सही होता है .. जैसे मानो किसी प्रोफेसर के दिए हुए गेस प्रश्न परीक्षा मे शर्तिया रूप से टकराते हैं, वैसे ही इन्हें पता होता है की फलना बाबु को गैस की बीमारी है, फलना बाबु को सुगर पकडे हुए है, और फलना बाबु का पेट का आकार बस इतना की थोडा चबा के किधर भी गुडक सकते हैं ... तो गूढ़ भोजनभट् लोग मौकापरस्त बनकर, बारिक को बियाह करवाने का लालच दे कर अपना वोट बैंक बना लेते हैं और फिर शुरू होती है वोटिंग... करीब 3 से 4 घंटे  रसगुल्ला और माउस खाने के बाद काउंटिंग शुरू होती है .. फिर शुरू होता है रुझान .... मंगल बाबु 300 रसगुल्ले से आगे चल रहे हैं, सुधीर बाबु अभी तक 4 किलो माउस देख चुके हैं, दिनेश मास्टर साहब 13 मटकुड़ी दही सुड़क चुके हैं.... 
 
हम फिर आयेंगे छोटे से व्यवसायिक विश्राम के बाद... आप देखते रहिये मंगल कुमार का बियाह मंगला कुमारी के साथ ... 
 
हालाँकि कुछ लोग ईमानदार और कर्मठ होते हैं ... जितना खायेंगे उतना ही पत्ता पर लेते हैं और उसे ईमानदारी से समाप्त भी करते हैं ... ऐसे लोगों का फ्यूचर डार्क है .. ये लोग कभी इस तरह के चुनाव नहीं जीत सकते... उल्टे, खाने वाले लोगों को डिमोटिवेट करते हैं ... मतलब वोट काट लेते हैं ... चुनावी भाषा मे वोटकटुआ .... वैसे भी ऐसे अच्छे लोगों को आजकल पूछता ही कौन है...
 
भोज के कई मौके होते हैं जो की इन राजनीती के जानकरों के डेटाबेस में पहले से उपलब्ध होते हैं... नौकरी लगने वाला भोज ,लड़की देखा-देखी बला भोज ,जमीन रजिस्ट्री बला भोज, ई बला भोज, ऊ बला भोज...
 
धूर यार हम फिर से मुद्दे से भटक गए थे ... बात राजनीती की हो रही थी ... तो भोज में बैठे लोग तब तक नहीं उठते जब तक अंतिम व्यक्ति का मन तृप्त ना हो जाये .. ये सही मायने मे हमारी संस्कृति है जो हर बिहारी के खून मे है ... 
सुबह के करीब तीन बज रहे थे और हमारे सुबोध कक्का 500 रसगुल्ले, 200 कालाजामुन, 4 किलो माउस और 14 मटकुड़ी दही से बढ़त बनाये थे .. सभी लोग इस प्रखर राजनीतिज्ञ की जयकार उद्घोष के साथ मनोबल बढ़ा रहे थे... लड़के के फूफा जी जो की आर्मी मे सूबेदार थे उन्होंने उनकी जीत की घोषणा करते हुए इस चुनावी संग्राम की समाप्ति की l फुल-माला के साथ लोगों ने सुबोध कक्का के साथ सेल्फी सेशन करवा के कंधे पर बिठा लिया (कंधे पर बैठने वाले युवा 201 बार दण्ड पेल कर आये थे )... 
 
सुबोध कक्का ने सौंफ फांकते हुए कहा... अब चीफ मिनिस्टर का कुर्सी के लिए फाइट करेंगे .....

Part 2 ...by Rajeev

बात तब की थी जब मैं दिल्ली में कुछ समय के लिए पार्टनर विहीन था, मतलब मेरा रूम पार्टनर ऑफिसियल टूर पर था। घर से ऑफिस और ऑफिस से घर... मैं सिर्फ पटपटगंज,ऑटो,भीड़ वाली सड़क (जिसे मैं सच मायने में नफरत करता था),सड़क किनारे की बिल्डिंग्स और अपने ऑफिस का 8वां मंजिल में उलझा सा था।
 
अकेले कभी तल्लीनता से खाना भी नहीं बना पाया... एक बार माँ ने फोन करके पूछा कि खाना खाये की नहीं, तुम्हारी आवाज कमजोर सी लग रही है.. समझ नहीं आया कि सच कहूं या थोड़ा सच... 
 
आवाज मोटी करके बोला ... हाल-चाल एक नम्बर माँ, अभी सो कर उठा हूँ।
 
माँ जानती हैं अपने बच्चों के बारे में... तबियत बिगड़ रही थी मेरी... धीरे-धीरे। 
 
मैं अनुभव कर रहा था कि मेरी तबियत बिगड़ने के कारण अनियमित दिनचर्या और खानपान है। आसान नहीं होता है अकेले रहना खासकर वैसे लोगों के लिए जो घर में सबसे छोटे हों। मैं भी घर में छोटा हूँ और स्वावभिक तौर पर मुझे भी घर में कुछ खासी आजादी थी, जैसे जबरदस्ती ज्यादा खाना खिलाना,मेरे  कपड़ों को नियमित रूप से सफाई करना। घर से बाहर ये सब मेरे लिए वास्तव में बहुत कठिन था। 
 
लेकिन अगर आप अपने-आप को रूम में ही खुद को समेट लेंगे तो फिर तो दिक्कतें होंगी ही...
 
दिल्ली में अब मछली से लेकर साग-सब्जी सब कुछ मिलता है...बथुआ का साग से लेकर और थोड़ा प्रयास करने पर तिलकोर भी मिल जाता है, अरबी से लेकर ओल भी मिल जाता है, एक बार यहां दिल्ली में खुम्हाउर भी देखा था...इंडिया गेट के पास तिलकोर का बहुत पौधा है...दरभंगा से सस्ता मछली दिल्ली में मिल जाता है...230 रुपये जिंदा मछली और दरभंगा में इसके लिए 350 तक देना होता है...प्रत्येक पर्व त्योहार के विधि का सारा सामान उपलब्ध है...
 
सबसे बड़ी उपलब्धि मुझे तब मिली जब मैंने अपने बिहार की शान सत्तू की लिट्टी लक्ष्मीनगर में देेेखा।
 
विश्वास मानिये मैंने उस दिन दो दिन के खाने का कोटा आधे घंटे में पूरा किया। करीब दर्जन भर डकार आने के बाद टेबल-कुर्सी को "स्वछंदाय नमः" कह कर माफ किया। जब तक दिल्ली में प्रवास रहा, शनिवार और रविवार मेरे लिए "सत्तू डे" रहता था। आज भी किसी मीटिंग के सिलसिले में जाना होता है तो लक्ष्मीनगर के लिए कैब जरूर बुक करता हूँ। 
एक बात और ... दिसम्बर में फिर जाना है और सत्तू प्लान पहले से सेट है। 
 
मेहनत तो करना होगा भाई...
 
मल्लब ऑप्शन्स थे बस पता नहीं था मुझे, बिहार से दूर हो कर बिहारी भोजन का पता चल जाना किसी जुपिटर ग्रह पर पानी मिल जाना है... 

Sattuz.....love for bihari food

 

मेरे जैसे आलस पसंद व्यक्तित्व के जीवन का सबसे कठिन काम या यूं कह लीजिए कि काला पानी टाइप सजा बचपन में मॉर्निंग स्कूल के लिए उठना होता था। पता नहीं माँ कब उठाती थी,कब नहलाती थी,कब टिफ़िन बैग में डालती थी और कब चीनी वाली सत्तू घोल के पिलाती थी। टिफ़िन तक तो आभास भी नहीं होता था कि भूख भी कोई चिड़िया है, हाँ उसके बाद कीर्त्तन होता था पेट में।
 
बिहार के बिहारी लोगों की रसोई बिना सत्तू के अधूरी है... अब मैनें बिहार के बिहारी लोग क्यों लिखा.. अरे कुछ लोग इसे देखकर भों सिकोड़ते हैं और 5स्टार रेस्तरां में 1200 रुपये का 2 सत्तू पराठा चबाते हैं। 
 
मल्लब उ प्रचार देखे हैं ना जिसमें कहता है "कौन हैं ये लोग,कँहा से आते हैं ये लोग"... 
 
खैर... बिहार अपने आप में इतिहासों का राज्य है। 
 
मेरा मानना है कि आप किसी भी राज्य,जिले,गाँव, कस्बे से हों, है आप हिंदुस्तानी ही... दक्षिण के डोसा/इडली-सांभर, मध्य प्रदेश का पोहा और मिर्ची वाली पकौड़ी, आसाम का ताम्बूल एवं अन्य भागों के खास व्यंजन जो आपकी पहचान बताते हैं,उसे अपने खून में बसा के रखिये। 
 
दिल्ली पहली बार गये तो घर से डब्बा में माँ के हाथ का बना आम का अचार और सत्तुआ लाए थे, धीरे-धीरे दोनों खत्म होने को आ गया था। जब भी खाने वक्त डब्बा खोल के अचार या भोर में दो चम्मच सत्तुआ निकाल रहे होते थे, खाली हो रहे डब्बे को देखकर लगता था जैसे कोई करेजा पर हथौड़ी मार रहा है। दिल बैठ सा जाता था... 
 
इस अचार और सत्तुआ के स्वाद का मोल कोई व्यापारी अपने जीवन में नहीं लगा सकता, ऐसा नहीं कि इसकी कीमत आसमान से ऊपर है क्योंकि इसमें बिहार के मिट्टी की खुशबू है,हमारे गाँवों की हवा है...
एक वक्त था की खाना में कम-से-कम दो तरकारी,पापड़,आलू बला तरुआ आ पतरका भात इम्पोर्टेन्ट था... और छुच्छा रोटी तो कभी सोहाया ही नहीं... 
 
फिर नौकरी ने दिल्ली का रास्ता दिखाया, एक ऐसा फौजी जिसे बंदूक चलाना नहीं आता हो और सीमा पर भेज दिया गया हो, वही हालात थी अपनी साहब। 
 
रूम पार्टनर ने रोटी बनाने के गुर सिखाये... भक्क साला, रोटी गोल बनती ही नहीं थी.. नक्शा बन जाता था... तीन महीने के कठिन ट्रेनिंग के बाद हम इतने एक्सपर्ट हो गए थे की मेरे बेले रोटी की बेहतरीन गोलाई देखकर चकला भी शर्मा जाता था ।
रात बहुत हो गयी अब जाता हूँ सोने इस पंक्ति के साथ...
 
है रात अंधेरी घुप्प मगर, 
कुछ जुगनू जिद पर बैठे हैं।
 
फिर मिलते हैं... अगली मुलाकात में...
 
-राजीव